भारत की प्रगति और विकास की नींव जिन मज़दूरों की मेहनत पर टिकी है, उनमें प्रवासी मज़दूरों की भूमिका सबसे अहम है। सड़क, पुल, इमारत, खेत-खलिहान, कारखाने या सेवा क्षेत्र—हर जगह उनकी मेहनत दिखती है। इन प्रवासी मज़दूरों में सबसे बड़ी संख्या बिहार से आने वाले श्रमिकों की है, जो देश के कोने-कोने में अपनी श्रमशक्ति से उद्योगों और शहरों को गति देते हैं। लेकिन यह भी एक विडंबना है कि जो मज़दूर राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करते हैं, वही राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक अधिकारों से सबसे अधिक वंचित रह जाते हैं।
बिहार का प्रवासन केवल आर्थिक मजबूरी का परिणाम नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और संरचनात्मक समस्या है। 19वीं सदी के गिरमिटिया मज़दूरों से लेकर आज के निर्माण स्थलों, खेतों और कारखानों में काम करने वाले प्रवासियों तक, उनकी कहानी लगभग समान है—कम रोज़गार के अवसर, मजबूरी में पलायन और फिर गंतव्य राज्यों में संघर्ष। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) के आँकड़े बताते हैं कि बिहार की बेरोज़गारी दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, जिसके कारण राज्य का हर तीसरा परिवार प्रवासन से जुड़ा हुआ है।
आर्थिक योगदान देने के बावजूद राजनीतिक भागीदारी से वंचित रह जाना प्रवासी मज़दूरों की सबसे बड़ी चुनौती है। वे न तो अपने कार्यस्थल की राजनीति में जगह बना पाते हैं और न ही बिहार में अपनी स्थायी राजनीतिक पहचान बचा पाते हैं। यही राजनीतिक अदृश्यता उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में हाशिए पर खड़ा कर देती है।

बिहार की कुल आबादी लगभग 13 करोड़ है, जिनमें से करीब 10 करोड़ लोग 15 वर्ष से अधिक आयु के हैं। चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग 3 करोड़ मज़दूर बिहार के बाहर प्रवासी मज़दूर के रूप में काम कर रहे हैं। ई-श्रम पोर्टल पर 16 जुलाई तक दर्ज आंकड़ों के अनुसार, प्रवासी मज़दूरों की संख्या के मामले में बिहार उत्तर प्रदेश के बाद देश में दूसरे स्थान पर है।
संवैधानिक अधिकार और प्रवासी मज़दूर
भारतीय संविधान ने प्रत्येक नागरिक को कुछ मौलिक अधिकार और राज्य के लिए कुछ नीति-निर्देशक तत्व दिए हैं। प्रवासी मज़दूरों की स्थिति को इन प्रावधानों की रोशनी में समझना ज़रूरी है।
- अनुच्छेद 19(1)(e): प्रत्येक नागरिक को भारत के किसी भी हिस्से में बसने और काम करने का अधिकार है। यह प्रवासी मज़दूरों के अधिकार को मान्यता देता है।
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार। सर्वोच्च न्यायालय ने “जीवन” की परिभाषा में सम्मानजनक जीवन, भोजन, आवास, स्वास्थ्य और रोज़गार को भी शामिल किया है। प्रवासी मज़दूरों के लिए यह सबसे अहम है।
- अनुच्छेद 23: बेगार और जबरन श्रम पर रोक।
- अनुच्छेद 39 (DPSP): समान काम के लिए समान वेतन।
- अनुच्छेद 41 (DPSP): काम करने का अधिकार और बेरोज़गार, वृद्ध, और बीमार नागरिकों की देखभाल।
- अनुच्छेद 43 (DPSP): जीविका का पर्याप्त साधन और मानवोचित काम की शर्तें।
इन प्रावधानों के बावजूद प्रवासी मज़दूर अपने अधिकारों से वंचित रहते हैं।
राजनीतिक समस्याएँ और बाधाएँ
1. मताधिकार से वंचित होना
भारत में लगभग 30 करोड़ से अधिक प्रवासी मजदूर हैं (Labour Ministry, 2020) इनमें से बड़ी संख्या चुनावों में मतदान नहीं कर पाती। चुनाव आयोग की मतदाता सूची सत्यापन प्रक्रिया के दौरान लाखों लोगों के नाम हट जाते हैं क्योंकि वे ग़ैर-हाज़िर पाए जाते हैं। बिहार में हाल ही में 35 लाख से अधिक नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए (Election Commission, 2025)
2. दोहरी पहचान की जटिलता
मज़दूर जहाँ काम करते हैं, वहाँ उन्हें बाहरी कहा जाता है और स्थानीय राजनीति में हाशिए पर रखा जाता है। वहीं, बिहार में उनकी गैर-मौजूदगी के कारण उनकी राजनीतिक पहचान कमज़ोर हो जाती है। वे आर्थिक रूप से मेज़बान राज्य में योगदान देते हैं, पर राजनीतिक रूप से बिहार पर निर्भर रहते हैं।
3. प्रशासनिक बाधाएँ
- घर-घर सत्यापन में अनुपस्थित होने पर मतदाता सूची से नाम कट जाना।
- पहचान पत्र, राशन कार्ड और अन्य दस्तावेज़ बाढ़ या पलायन की वजह से गुम हो जाना।
- अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग श्रम कानूनों की जटिलता।
4. डिजिटल निरक्षरता
आज सरकारी सेवाएँ और योजनाएँ ऑनलाइन हो गई हैं, लेकिन अधिकांश प्रवासी मज़दूर डिजिटल साक्षर नहीं हैं। श्रम पोर्टल पर पंजीकरण, ई-श्रम कार्ड बनवाना, या योजना का लाभ उठाना उनके लिए कठिन है।
5. सामाजिक बहिष्कार
गंतव्य राज्यों में उन्हें अक्सर संदेह की नज़र से देखा जाता है। स्थानीय रोज़गार और संसाधनों पर बोझ समझा जाता है। कोविड-19 के दौरान कई राज्यों ने “बाहरी” मज़दूरों को लेकर नकारात्मक नीतियाँ अपनाईं।
कोविड-19 का प्रभाव
कोविड-19 महामारी प्रवासी मजदूरों के लिए सबसे बड़ा संकट लेकर आई। लॉकडाउन की घोषणा होते ही करोड़ों मजदूर अचानक बेरोज़गार हो गए। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 40 करोड़ से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे धकेले जाने के जोखिम में थे, जिनमें बड़ी संख्या प्रवासी मज़दूरों की थी।
हज़ारों मजदूर पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करके बिहार लौटे। कई लोगों की रास्ते में मौत हो गई। यह संकट बताता है कि मज़दूरों के लिए न तो कोई ठोस सामाजिक सुरक्षा थी और न ही सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था।
सरकार की पहलें
1. भारत सरकार
- वन नेशन, वन राशन कार्ड (ONORC): 2019 में शुरू हुई इस योजना के तहत प्रवासी कहीं भी राशन ले सकते हैं। मार्च 2023 तक 100% राज्यों में लागू (Ministry of Consumer Affairs)
- ई-श्रम पोर्टल (2021): असंगठित मजदूरों का राष्ट्रीय डाटाबेस। बिहार से लगभग 3 करोड़ श्रमिक पंजीकृत।
- प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY): कोविड-19 के दौरान मुफ्त अनाज।
2. बिहार सरकार
- मुख्यमंत्री श्रमिक राहत योजना (2020): कोविड-19 के दौरान लौटे प्रवासियों को ₹1000 की सहायता।
- बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड और कौशल विकास मिशन: युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार योग्य बनाना।
- बिहार प्रवासी श्रमिक आयोग (प्रस्तावित): प्रवासियों की समस्याओं को हल करने के लिए।
नीतियों की खामियाँ
- ONORC: कई मजदूरों के पास आधार और राशन कार्ड लिंक न होने से लाभ नहीं मिल पाता।
- ई-श्रम पोर्टल: पंजीकरण तो हुआ लेकिन बीमा और पेंशन जैसी योजनाएँ ज़मीनी स्तर तक नहीं पहुँचीं।
- राज्य-केंद्र समन्वय की कमी: प्रवासी बिहार के हैं लेकिन काम गुजरात में करते हैं, ऐसे में श्रम कानून लागू करने में भ्रम।
- सामाजिक सुरक्षा की कमी: आज भी प्रवासी मजदूर स्वास्थ्य बीमा, न्यूनतम वेतन और रोजगार की स्थिरता से वंचित हैं।
अतिरिक्त चुनौतियाँ
- श्रम कानूनों में बदलाव: नए श्रम संहिताएँ (Labour Codes, 2020) लचीलापन तो देती हैं, लेकिन प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा कम कर देती हैं।
- शहरी जीवन की कठिनाई: झुग्गियों में रहना, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और बच्चों की शिक्षा में बाधा।
- जाति और वर्ग आधारित भेदभाव: बिहार से आने वाले मजदूरों को कई जगह कमज़ोर वर्ग मानकर शोषण किया जाता है।
आँकड़े और तथ्य (स्रोत सहित)
- भारत में प्रवासी मजदूरों की संख्या: 30–40 करोड़ (Labour Ministry, 2020)
- बिहार से बाहर काम करने वाले श्रमिक: लगभग 1.75 करोड़ (Economic Survey of Bihar, 2022-23)
- बेरोज़गारी दर (बिहार): 13% बनाम राष्ट्रीय औसत 7.8% (CMIE, 2023)
- कोविड-19 में घर लौटे मजदूर: 1 करोड़ से अधिक (Bihar Govt., 2020)
- ई-श्रम पोर्टल पर बिहार के पंजीकृत श्रमिक: 3 करोड़+ (Ministry of Labour, 2023)
आपके द्वारा साझा किए गए चार्ट के आधार पर बिहार के प्रवासी मज़दूरों के रोज़गार क्षेत्रों का विश्लेषण इस प्रकार है। यह डेटा उन पंजीकृत मज़दूरों से संबंधित है जिन्होंने 50 से अधिक जॉब रोल्स में अपना नाम दर्ज कराया है, जिन्हें 11 प्रमुख श्रेणियों में बाँटा गया है:

डेटा का विश्लेषण
- Migrant Workers (36%)
- सबसे बड़ा वर्ग प्रवासी मज़दूरों का है, जो विभिन्न असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं।
- इसमें दिहाड़ी मज़दूरी, अस्थायी निर्माण कार्य, कृषि में मौसमी श्रम, परिवहन और अन्य अस्थायी काम शामिल हैं।
- यह दर्शाता है कि बड़ी संख्या में मजदूर किसी स्थायी स्किल या औपचारिक रोजगार से जुड़े नहीं हैं।
- Construction (28%)
- दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र निर्माण (कंस्ट्रक्शन) है।
- बिहार के प्रवासी मज़दूर दिल्ली, मुंबई, गुजरात और दक्षिण भारत के राज्यों में निर्माण स्थलों पर इमारत, पुल, सड़क और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में लगे रहते हैं।
- यह उच्च मांग वाला क्षेत्र है, लेकिन इसमें सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा की भारी कमी रहती है।
- Fabrics and Handicraft (9%)
- यह क्षेत्र विशेष रूप से पारंपरिक हस्तकला, बुनाई, सिलाई और छोटे उद्योगों से जुड़ा है।
- बिहार के कई जिलों (जैसे भदोही, भागलपुर आदि) के लोग टेक्सटाइल और हैंडलूम उद्योगों से जुड़े रहते हैं।
- Metal and Woodwork (6%)
- लकड़ी और धातु आधारित कार्य (जैसे फर्नीचर बनाना, वेल्डिंग, कारपेंट्री, लोहे का काम) में श्रमिक लगे रहते हैं।
- यह कौशल-आधारित क्षेत्र है लेकिन मजदूरी कम और सुरक्षा कमजोर रहती है।
- Personal Services (5%)
- इसमें घरेलू कामकाज, ब्यूटी पार्लर, हेल्पर और सफाई जैसे सेवाएँ शामिल हैं।
- प्रवासी मज़दूरों की बड़ी संख्या शहरी इलाकों में इस क्षेत्र में कार्यरत है।
- Home and Electronics (5%)
- घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स की मरम्मत और इंस्टॉलेशन (जैसे टीवी, पंखा, फ्रिज, एसी, छोटे उपकरण) का काम शामिल है।
- यह स्किल-आधारित रोजगार है, लेकिन इसमें रोजगार का स्वरूप अनौपचारिक है।
- Automobile (4%)
- ऑटोमोबाइल रिपेयरिंग और मैकेनिक से जुड़े कार्य इस श्रेणी में आते हैं।
- कई बिहारी प्रवासी गेराज, वर्कशॉप और ट्रक/ऑटो रिपेयर कार्य में कार्यरत हैं।
- Computer and Mobile (0%)
- इस श्रेणी में बिहार के प्रवासी श्रमिकों का लगभग कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।
- इसका अर्थ है कि तकनीकी और डिजिटल स्किल वाले रोजगारों में इनकी हिस्सेदारी बेहद कम है।
मुख्य निष्कर्ष
- प्रवासी मजदूर मुख्यतः असंगठित और श्रम-प्रधान क्षेत्रों (निर्माण और दिहाड़ी मजदूरी) में केंद्रित हैं।
- कौशल आधारित क्षेत्रों जैसे कपड़ा उद्योग, मेटल-वुडवर्क और इलेक्ट्रॉनिक्स में भी मजदूर काम कर रहे हैं, लेकिन इनकी हिस्सेदारी कम है।
- तकनीकी क्षेत्रों (कंप्यूटर और मोबाइल) में लगभग कोई भागीदारी नहीं है, जो यह दिखाता है कि डिजिटल और टेक्नोलॉजी स्किल्स की कमी है।
- इससे साफ है कि बिहार के प्रवासी मजदूरों का सबसे बड़ा संकट कौशल असमानता (Skill Gap), सामाजिक सुरक्षा की कमी, और अस्थायी रोजगार है।
निष्कर्ष
बिहार के प्रवासी मज़दूर देश की आर्थिक प्रगति के असली निर्माता हैं, लेकिन विडंबना यह है कि जो मज़दूर देश को आगे बढ़ाते हैं, वही राजनीतिक अधिकारों, सामाजिक सुरक्षा और मानवीय गरिमा से वंचित रहते हैं। संविधान ने उन्हें जीने, काम करने और सम्मानजनक जीवन पाने का अधिकार दिया है, फिर भी हकीकत यह है कि न तो वे अपने राज्य में पूरी तरह राजनीतिक भागीदारी कर पाते हैं और न ही गंतव्य राज्यों में सामाजिक स्वीकार्यता पाते हैं।
कोविड-19 ने साफ कर दिया कि मज़दूरों के लिए ठोस नीतियाँ और सुरक्षा कवच अब सिर्फ विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता हैं। सरकार ने ई-श्रम पोर्टल, वन नेशन वन राशन कार्ड जैसी योजनाएँ शुरू की हैं, लेकिन ज़मीन पर इनका असर सीमित है। सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नीतियाँ केवल कागज़ पर न रह जाएँ, बल्कि मज़दूरों तक सीधे पहुँचें।
भविष्य की राह यही है कि प्रवासी मजदूरों को केवल “सस्ता श्रम” मानने के बजाय “नागरिक” और “निर्माता” के रूप में देखा जाए। उनके मताधिकार की गारंटी, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का सही क्रियान्वयन, और स्थानीय स्तर पर रोज़गार के अवसर ही बिहार से पलायन को कम कर सकते हैं। जब तक मज़दूरों को उनके संवैधानिक अधिकार और सम्मानजनक जीवन नहीं मिलेगा, तब तक भारत की लोकतांत्रिक यात्रा अधूरी रहेगी।


Leave a Reply