गिरमिटिया भारतीयों की पहचान, साहित्य और संस्कृति के उत्थान में आर्य समाज का योगदान अत्यंत प्रेरणादायक रहा है. आर्य समाज के बिना गिरमिटिया समुदाय के साहित्य और संस्कृति के उत्थान की बात अधूरी है. आर्य समाज न केवल धार्मिक संगठन था, बल्कि वह सांस्कृतिक पुनर्जागरण का वाहक भी बना. आज यदि गिरमिटिया देशों में हिंदी भाषा, वैदिक परंपराएँ और भारतीय संस्कृति की झलक देखी जाती है, तो उसमें आर्य समाज की दीर्घकालीन सेवाओं और सतत प्रयासों का बड़ा हिस्सा है. जब भारतीय गिरमिटिया श्रमिकों को 19वीं और 20वीं शताब्दी में अनुबंध (गिरमिट) के तहत फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम, गयाना, त्रिनिदाद एण्ड टोबागो और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में ले जाया गया, तो वे अपने साथ भारतीय संस्कृति, परंपरा, भाषा और धार्मिक आस्थाएं भी लेकर गए. इस सांस्कृतिक धरोहर को बचाने और उसे संगठित करने में आर्य समाज ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वास्तव में, आर्य समाज ने प्रवासी भारतीयों के बीच एक नया आत्मविश्वास, वैदिक गर्व और सांस्कृतिक आधार तैयार किया — जो आज भी उनकी अस्मिता की नींव बना हुआ है.
गिरमिटिया देशों में आर्य समाज की महत्वपूर्ण भूमिका
1. धार्मिक पुनर्जागरण और पहचान की रक्षा गिरमिटिया मजदूरों के बीच हिंदू धर्म की शिक्षा और उसकी वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करने का कार्य आर्य समाज ने किया. ईसाई मिशनरियों द्वारा जबरन धर्मांतरण की कोशिशों के विरुद्ध आर्य समाज ने संगठित प्रतिक्रिया दी और यज्ञ, वेद-पाठ, सत्संग जैसे धार्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से गिरमिटिया मजदूरों के मध्य हिन्दू धर्म को जीवंत रखा गया.
2. हिंदी भाषा- साहित्य और शिक्षा का प्रचार आर्य समाज ने हिंदी को गिरमिटिया देशों में शिक्षा और संवाद की भाषा बनाने में मदद की. आर्य समाज द्वारा स्थापित विद्यालयों और गुरुकुलों में हिंदी, संस्कृत और वेदों की पढ़ाई करवाई गई. इससे गिरमिटिया साहित्य का विकास हुआ. आर्य समाज द्वारा सभी गिरमिटिया देशों मे कई विद्यालयों और शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की जहाँ लड़के और लड़कियों दोनों को शिक्षा दी जाती थी. महिलाओं की शिक्षा पर भी विशेष जोर दिया गया, जिससे समाज में जागरूकता आई और महिला लेखिकाओं का भी उदय हुआ.
3. सामाजिक सुधार और सांस्कृतिक आयोजनों का संचालन छुआछूत, बाल विवाह, स्त्रियों की स्थिति जैसी कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता अभियान चलाए गए. विवाह संस्कारों में वैदिक पद्धति को अपनाया गया और दहेज जैसी बुराइयों के खिलाफ काम किया गया. आर्य समाज ने जातिवाद के विरुद्ध एकता की भावना को बल दिया. आर्य समाज ने त्योहारों, यज्ञों और वैदिक संस्कारों के माध्यम से प्रवासी भारतीयों को सांस्कृतिक रूप से जोड़े रखा. संगीत, भजन, रामायण-महाभारत की कथा-वार्ता (जिसे बैठका भी कहा जाता है) और नाटक जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से हिंदी साहित्य की नींव मजबूत हुई.
प्रमुख गिरमिटिया देशों में आर्य समाज की उपस्थिति
- मॉरीशस: 1910 में आर्य समाज की स्थापना हुई। आर्य सभा के माध्यम से धार्मिक शिक्षा और शुद्धि आंदोलन चला। साहित्य के विकास में भी योगदान.
- फिजी: आर्य समाज ने स्कूल और मंदिरों की स्थापना की। ईसाई मिशनरियों के प्रभाव को संतुलित करने में भूमिका निभाई.
- सूरीनाम: आर्य समाज ने गिरमिटिया हिन्दुओं की धार्मिक पहचान बचाने के लिए यज्ञ और वेद अध्ययन की परंपरा स्थापित की.
- गयाना: भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए आर्य समाज की शाखाएं बनीं। शुद्धि और शिक्षा कार्यों पर जोर.
- त्रिनिदाद: सामाजिक सुधार आंदोलनों में सक्रिय। धार्मिक संस्कारों और हिंदी भाषा का संरक्षण किया.
मॉरीशस में आर्य समाज
“आर्य समाज” मॉरीशस में एक हिन्दू सुधार आंदोलन है. आर्य समाज का बीज मॉरीशस में 1898 में सूबेदार भोलानाथ तिवारी द्वारा “सत्यार्थ प्रकाश” की एक प्रति लाने के साथ बोया गया था, जो स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा लिखी गई थी. 1903 में, आर्य सभा मॉरीशस की स्थापना “आर्य प्रतिनिधि सभा” के रूप में क्यूरपिप नगर में हुई थी. उस समय, आर्य सभा का मुख्य काम साप्ताहिक सत्संग और धार्मिक समारोहों का आयोजन करना था. खेमलाल लाला को आर्य प्रतिनिधि सभा का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था, और उन्हें आर्य सभा मॉरीशस के संस्थापक के रूप में जाना जाता है. सन 1911 में, पोर्ट लुई में आर्य सभा मॉरीशस की स्थापना हुई, जो “आर्य परोपकारिणी सभा” के रूप में 5 दिसंबर को पंजीकृत हुई. 1907 में मणिलाल डॉक्टर के आगमन ने आर्य आंदोलन को गति प्रदान की. पेशे से वकील मणिलाल ने आर्य समाज के लिए एक नियमित हिंदी पत्रिका प्रकाशित की. आर्य समाज का मॉरीशस में भारतीय मूल के लोगों के धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक जीवन पर बहुत प्रभाव रहा है. आर्य समाज ने हिन्दुओं को प्रगतिशील हिन्दू धर्म का विकल्प प्रदान किया है, हिंदी पर विशेष जोर देते हुए हिन्दी शिक्षा को बढ़ावा दिया है और अनाथालयों, प्राथमिक विद्यालयों, कॉलेजों की स्थापना की है.
आर्य समाज ने प्रचारकों के रूप में प्रशिक्षित होने के लिए युवकों को भारत भेजा और भारत से प्रचारकों को मॉरीशस आने के लिए संगठित किया. ऐसे ही एक प्रचारक स्वामी स्वतंत्रानंद थे जो 1914 में मॉरीशस पहुंचे. उन्होंने हिंदी सीखने को बढ़ावा दिया और आर्य पत्रिका हिंदी में एक समाचार पत्र जो आर्य समाज की आवाज था, उसमें सुधार किया. वे 1916 में आर्य समाज की अच्छी तरह से स्थापना के साथ भारत लौट आए और उनके काम को पंडित काशीनाथ किस्तो ने आगे बढ़ाया, जिन्हें धार्मिक प्रशिक्षण के लिए भारत भेजा गया था. किस्तो ने रूढ़िवादी हिन्दुओं के साथ सार्वजनिक बहस में भाग लिया लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान हिंदी स्कूलों की स्थापना करना था. 1924 में, आर्य वैदिक स्कूल की स्थापना की गई और बाद में दो अन्य प्राथमिक स्कूलों की स्थापना की गई. पोर्ट लुइस का डीएवी कॉलेज भी स्थापित किया गया.
1927 में आर्य समाज की एक और संस्था, जिसे आर्य प्रतिनिधि सभा के नाम से जाना जाता है, का गठन किया गया, जिसे आर्य समाज के कुछ दिग्गजों का समर्थन प्राप्त था. इस नई संस्था को नई दिल्ली स्थित सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा (आर्य समाज की विश्व परिषद) से मान्यता प्राप्त हुई और यह लोकप्रिय हुई. स्वामी दयानंद की पुण्यतिथि 1933 में दोनों आर्य समाज संगठनों द्वारा अलग-अलग मनाई गई. 1934 में, परोपकारिणी सभा से एक और समूह अलग हो गया और उसने आर्य रवि वेद प्रचारिणी सभा का गठन किया. इन मतभेदों के बावजूद, आर्य समाज का कार्य, विशेष रूप से वैदिक शिक्षाओं और हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में, 1950 तक जारी रहा, जब सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा ने कूटनीति के माध्यम से एकता बहाल करने के लिए स्वामी स्वतंत्रानंद सरस्वती को भेजा. लंबी बातचीत के बाद आर्य परोपकारिणी सभा और आर्य प्रतिनिधि सभा ने आर्य सभा मॉरीशस बनाने के लिए विलय पर सहमति व्यक्त की, स्वामी स्वतंत्रानंद सरस्वती भारत लौट आए और नई सभा की कार्यकारिणी के पहले चुनाव में आर्य प्रतिनिधि सभा के सभी पूर्व सदस्य अपनी सीटें हार गए. इसके बाद उन्होंने 1954 में आर्य प्रतिनिधि सभा का पुनर्गठन किया. सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा ने एक बार फिर हस्तक्षेप किया और स्वामी ध्रुवानंद सरस्वती को भेजा, जिन्होंने 1958 में आर्य प्रतिनिधि सभा को आर्य सभा मॉरीशस में विलय के लिए राजी कर लिया. 1970 में, आर्य सभा मॉरीशस और आर्य रवि वेद प्रचारिणी सभा ने संयुक्त रूप से मॉरीशस में आर्य समाज की स्थापना की साठवीं वर्षगांठ मनाई.
आर्य समाज द्वारा मॉरीशस में आर्य विद्या मंदिर और आर्य युवक संघ की स्थापना हुई. आर्य समाज द्वारा मॉरीशस में कई हिंदी माध्यमिक विद्यालयों की स्थापना की गई है. इनमें संस्कृत, हिंदी, वैदिक धर्मशास्त्र और आधुनिक विषय पढ़ाए जाते हैं. आर्य यूथ विंग के माध्यम से युवाओं में वैदिक जीवनशैली, अनुशासन और नैतिकता का प्रचार. खेल, संगीत, सांस्कृतिक गतिविधियाँ और नेतृत्व विकास कार्यशालाएँ और युवा सम्मेलन और शिविरों का आयोजन किया जाता है.

फिजी में आर्य समाज
फिजी एक प्रमुख गिरमिटिया देश है जहाँ 1879 से लेकर 1916 तक लगभग 60,000 भारतीयों को गिरमिटिया श्रमिकों के रूप में ब्रिटिश उपनिवेशों द्वारा ले जाया गया. विदेशी भूमि पर भारतीयों की धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को बचाने में आर्य समाज की विशेष भूमिका रही. फिजी में आर्य समाज ने शिक्षा, सामाजिक सुधार और वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु संगठित प्रयास किए. शिक्षा, सामाजिक सुधार, और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के माध्यम से फिजी में बसे भारतीय मूल के लोगों की पहचान को संरक्षित रखने का श्रेय आर्य समाज को जाता है. आज भी फिजी की धार्मिक-सामाजिक संरचना में आर्य समाज की जड़ें गहरी हैं.
आर्य प्रतिनिधि सभा फिजी (Arya Pratinidhi Sabha of Fiji) फिजी में आर्य समाज की सबसे प्रमुख संस्था आर्य प्रतिनिधि सभा फिजी है, इसकी स्थापना साल 1918 सुवा, फिजी में की गई. स्वामी श्रद्धानंद और आर्य समाज भारत से प्रेरणा लेकर फिजी के आर्य समाजियों ने इस संस्था की स्थापना की. जिसका गहरा प्रभाव फिजी में बसे भारतीय गिरमिटिया समुदाय के सामाजिक जीवन पर पड़ा और हिंदुत्व को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही.
आर्य प्रतिनिधि सभा फिजी के प्रमुख कार्य:
- शिक्षा का प्रचार: फिजी आर्य समाज ने लगभग 16 प्राइमरी स्कूल, 5 सेकेंडरी स्कूल और एक कॉलेज (Arya College) की स्थापना की है. प्रमुख विद्यालयों में शामिल हैं DAV College, Nabua और Arya Samaj Girls School. इन संस्थाओं में हिंदी, संस्कृत, गणित, विज्ञान आदि विषयों की शिक्षा दी जाती है. यहाँ लड़कियों की शिक्षा को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया गया.
- धार्मिक पुनर्जागरण: धार्मिक पुनर्जागरण के माध्यम से यज्ञ, हवन, वेद पाठ, प्रवचन, वैदिक संस्कार आदि नियमित रूप से कराए जाते हैं. शुद्धि आंदोलन के अंतर्गत धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को पुनः वैदिक धर्म में लाया गया. वेदों और उपनिषदों की शिक्षा दी जाती है.
- सामाजिक सुधार: इस अभियान के माध्यम से बाल विवाह, पर्दा प्रथा, अंधविश्वास आदि के विरुद्ध जनजागरण किया गया. साथ ही फिजी में आर्य समाज ने नारी सशक्तिकरण और विवाह सुधार की दिशा में कार्य किए.
- भाषा और संस्कृति का संरक्षण: हिंदी भाषा के प्रचार के लिए भाषण, लेखन और काव्य पाठ जैसे कार्यक्रम. भारतीय त्योहारों जैसे दीपावली, होली, और वेद सम्मेलन का आयोजन.
अन्य सहायक संस्थाएँ (संबद्ध संस्थाएँ):
- आर्य कन्या पाठशाला ( लड़कियों के लिए शिक्षा )
- फिजी आर्य महिला समाज ( महिलाओं के सशक्तिकरण हेतु संगठन )
- आर्य युवक परिषद ( युवाओं के लिए नेतृत्व विकास )

सूरीनाम में आर्य समाज का इतिहास
सूरीनाम में आर्य समाज का इतिहास 20वीं सदी की शुरुआत में शुरू हुआ, जब 1911 में एक भारतीय वैदिक मिशनरी प्रोफेसर, भाई परमानंद ने वेस्ट इंडीज का दौरा किया था. इसके बाद, 1929 में, एक छत्र संगठन, आर्य दिवाकर महासभा (Vereniging Arya Diwaker) की स्थापना हुई, जिसने आर्य समाज के कार्यों को संगठित किया. आर्य दिवाकर ने 1930 में एक धार्मिक निकाय के रूप में पंजीकरण कराया और 1932 में वैदिक पुजारियों का प्रशिक्षण शुरू किया. 1933 में, उन्होंने एक अनाथालय और बोर्डिंग स्कूल भी खोला. सूरीनाम में आर्य समाज ने न केवल धार्मिक गतिविधियों में, बल्कि शिक्षा और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है. आर्य दिवाकर ने एक मंदिर का निर्माण भी किया, जो सूरीनाम और दुनिया भर के हिन्दुओं के लिए एक महत्वपूर्ण पूजा स्थल बन गया. आर्य समाज ने सूरीनाम के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
सूरीनाम में आर्य समाज के विकास के मुख्य बिंदु:
- 1911: प्रोफेसर भाई परमानंद का सूरीनाम दौरा, आर्य समाज की स्थापना की नींव रखी.
- 1929: आर्य दिवाकर महासभा का गठन.
- 1930: आर्य दिवाकर का धार्मिक निकाय के रूप में पंजीकरण.
- 1932: वैदिक पुजारियों का प्रशिक्षण शुरू.
- 1933: स्वामी दयानंद अनाथालय (अनाथालय और बोर्डिंग स्कूल) की स्थापना.
- 1948: आर्य महिला समाज की स्थापना.
- 1958: दूसरा अनाथालय बनाया गया.
आर्य दिवाकर महासभा और आर्य प्रतिनिधि सभा सूरीनाम पारामारिबो में “आर्य दिवाकर महासभा” नाम से आर्यों के जिस केंद्रीय संगठन का निर्माण हुआ था, वह केवल धर्म-प्रचार के लिए ही प्रयत्नशील नहीं था, अपितु उस के सम्मुख भारतीय मूल के उन व्यक्तियों को पुनः हिन्दू-समाज में सम्मिलित करने की समस्या भी विद्यमान थी, जिन्होंने कि गत वर्षों में ईसाई मत को ग्रहण कर लिया था. इस समय तक ऐसे ईसाइयों की संख्या 14,000 के लगभग हो चुकी थी. सूरीनाम के भारतीयों में ईसाइयत के प्रचार के दो मुख्य कारण थे – (१) देश में सर्वत्र क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा स्थापित स्कूलों की सत्ता और (२) ईसाई अनाथालय, जो भारतीय बच्चे मिशनरी स्कूलों में पढ़ते थे और जिन अनाथ बच्चों का पालन-पोषण ईसाई अनाथालयों में होता था, वे स्वाभाविक रूप से क्रिश्चिएनिटी के प्रभाव में आते थे. इस दशा में पण्डित रामप्रसाद शुक्ल आदि आर्य कार्यकर्ताओं ने यह आन्दोलन चलाया, कि सरकार द्वारा भारतीय बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल स्थापित किये जाएँ, जिससे कि उन्हें क्रिश्चियन स्कूलों में पढ़ाने की आवश्यकता न रहे. यह आन्दोलन सफल हुआ और भारतीय बच्चे ऐसे सरकारी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने लगे जिनका वातावरण क्रिश्चियन नहीं था. दूसरी समस्या अनाथों की थी. उसके समाधान का भी निर्णय किया गया. उसके लिए उपयुक्त भवन का निर्माण कर लिया गया और 18 अक्तूबर 1933 को दयानन्द निर्वाण अर्ध-शताब्दी के अवसर पर अनाथालय का औपचारिक रूप से उद्घाटन भी कर दिया गया. महर्षि दयानन्द सरस्वती के नाम पर इसका नाम “स्वामी दयानन्द अनाथालय” रखा गया. शुरु में इसमें 14 बच्चे दाखिल हुए, पर बाद में उनकी संख्या में निरन्तर वृद्धि होती गयी और शीघ्र ही वह 44 तक पहुंच गयी.
मार्च 1935 में सूरीनाम में एक ऐसी घटना हुई, जिससे कि वहाँ आर्यसमाज को बहुत बल मिला. 8 मार्च के दिन बकरा-ईद के त्यौहार पर मुसलमानों ने कुर्बानी के लिए एक गाय का जुलूस निकाला और यह नारा लगाया, कि “यह हिन्दुओं की माता है ।” इससे हिन्दू लोग भड़क गए और सर्वत्र विक्षोभ उत्पन्न हो गया. अब तक पौराणिक हिन्दू आर्यसमाजियों का प्रायः विरोध करते रहते थे, पर उस घटना के कारण वे भी आर्यों के साथ हो गये और सबने मिलकर मुसलमानों के बहिष्कार का निर्णय किया. 13 मार्च 1934 को आर्य दिवाकर महासभा के मैदान में एक विशाल सभा की गई, जिसमें 14 हजार के लगभग हिन्दू उपस्थित थे. कुर्बानी की गाय का जुलूस निकालकर और उसमें अपमानजनक नारे लगाकर मुसलमानों ने जो अत्यन्त अनुचित व घृणास्पद कार्य किया था, सभा में उसका तीव्र रूप से विरोध किया गया. इस आन्दोलन का नेतृत्व आर्य दिवाकर द्वारा किया जा रहा था. अतः स्वाभाविक रूप से सूरीनाम के हिन्दुओं में उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया और उसे न केवल आर्यसमाजियों का ही, अपितु समस्त हिन्दुओं का सशक्त संगठन माना जाने लगा.
सन् 1948 में सूरीनाम में “आर्य महिला समाज” की भी स्थापना हुई. शुरू में इस समाज के सदस्यों की संख्या केवल बीस थी. पर इस समाज की महिलाओं में धर्म-प्रचार और समाज-सेवा के लिए अनुपम उत्साह विद्यमान था. इसीलिए दयानन्द अनाथालय का संचालन व प्रबन्ध आर्य दिवाकर द्वारा इसी समाज को दे दिया गया था. महिला-समाज की स्थापना तथा संचालन में श्रीमती देवराजी मंडल का कर्तृत्व सर्वाधिक था. वह एक विदुषी महिला थी, आर्य सिद्धांतों का उन्हें समुचित ज्ञान था और धर्मोपदेश तथा प्रवचन में भी वह अत्यंत निपुण थी. उनके अनथक परिश्रम से आर्य महिला-समाज की निरन्तर उन्नति होती गई. सन् 1960 में श्रीमती मंडल सूरीनाम से हालैंड चली गई थी. उनके पश्चात महिला-समाज का संचालन श्रीमती रुक्मिणी अभिलाख ने अपने हाथों में ले लिया और उन्होंने उसके कार्य में शिथिलता नहीं आने दी.
भारत से सूरीनाम में प्रचार के लिए आने वाले प्रमुख विद्वान, पण्डित, सन्यासी तथा प्रचारकों का नाम :- पण्डित जैमिनी (सन् 1921), पण्डित हरिप्रसाद (सन् 1932), पण्डित अयोध्याप्रसाद (सन् 1934), पण्डित सत्याचरण शास्त्री (सन् 1935), पण्डित भास्करानन्द (सन् 1936), पण्डित श्रुतिकान्त (सन् 1936), पण्डित नारायणदत्त (सन् 1938), प्रोफेसर रामसहाय (सन् 1944), पण्डित प्रेमानन्द (सन् 1948), पण्डित उषबुध (सन् 1957), पण्डित देवप्रकाश पातञ्जल (सन् 1957), महात्मा आनन्द स्वामी (सन् 1969), पण्डित श्रुतिलाल शर्मा (सन् 1972), पण्डित श्यामसुन्दर स्नातक (सन् 1979), पण्डित धर्मपाल शास्त्री (सन् 1996), स्वामी सत्यम् (सन् 1998), डॉ० रविप्रकाश आर्य (सन् 2002) के नाम उल्लेखनीय हैं. इतने आर्य विद्वानों का इस सुदूर देश में धर्मप्रचार के लिए आना ही यह सूचित करने के लिए पर्याप्त है कि यहाँ आर्यसमाज का कितना अधिक प्रचार है. इस प्रसंग में यह बता देना भी आवश्यक है कि भारत से बाहर सूरीनाम ही ऐसा देश है जहाँ कि सर्वसाधारण जनता की भाषा हिन्दी है, और जहाँ इस भाषा की पढ़ाई की पर्याप्त रूप से समुचित व्यवस्था है. यहाँ आर्यसमाज का एक प्रधान कार्य हिन्दी भाषा का प्रचार भी रहा है. साथ ही आर्य दिवाकर की ओर से एक “आर्य दिवाकर सन्देश” नामक मासिक पत्रिका हिन्दी-डच में नियमित रूप से प्रकाशित होती है.

गयाना में आर्य समाज की स्थापना और इतिहास
गयाना में पहले आर्य समाज संस्था का नाम गयाना सेंट्रल आर्य समाज था. यह गयाना में सभी आर्य समाज मंदिरों का मूल निकाय है. 1930 के दशक में, गयाना में आर्य समाज की स्थापना हुई थी और इसका प्रबंधन एक केंद्रीय कार्यकारी समिति द्वारा किया जाता है, जो पूरे गयाना में आर्य समाज गतिविधियों का प्रशासन और समन्वय करती है. 1936 में पंडित भास्करानंद आए और दस वर्षों तक गयाना में रहे, विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन किया. गयाना में सन 1955 में पंडित उषारबुद्ध आर्य आए और उन्होंने विशेष रूप से युवा संगठन आर्य वीर दल की स्थापना किया. आर्य वीर दल स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारतीय मूल के युवाओं को भारतीय संस्कृति के साथ जोड़ना और सामाजिक कार्यों के लिए उनको प्रेरित करना था. क्योंकि ईसाई मिशनरियों ने भारतीय समुदाय के युवाओं को शिक्षा और आर्थिक मदद देने के बहाने धर्म परिवर्तन का बड़ा मुहिम चला रखा था. आर्य समाज ने गयाना मे भी हिन्दी और संस्कृत के संरक्षण पर बड़ा काम किया साथ लोगों में यज्ञ करने और धार्मिक आयोजन से जुड़ने के लिए लोगों मे बड़ी जागरूकता अभियान चलाया जिसका लाभ भी हुआ, और लोग धर्म परिवर्तन से खुद को बचाया.

त्रिनिदाद एण्ड टोबागो में आर्य समाज
भाई परमानन्द त्रिनिदाद पहुंचने वाले पहले आर्य समाजी थे, जो 1910 में वहाँ पहुँचे थे. बाद में कई अन्य पंडितों ने उनका अनुसरण किया. 1929 में पंडित मेहता जैमिनी आये और उनके प्रयासों से माराबेला में आर्य समाज के एक भवन का निर्माण कराया गया, जहाँ हिंदी कक्षाएं आयोजित की जाती थीं. सन 1934 में पंडित अयोध्या प्रसाद पहुंचे, और स्थानीय आर्य समाज समुदाय उनसे इतना प्रभावित हुआ कि उन्हें तीन साल के लिए अपने प्रवास को बढ़ाने के लिए उनसे निवेदन किया गया. अयोध्या प्रसाद ने अन्य धर्मों के कई लोगों की शुद्धि (धर्मान्तरण) की. यह बहुत महत्वपूर्ण बात है क्योंकि त्रिनिदाद में भारत से आये हुए बहुत से लोग ईसाई बन गए थे, जबकि गयाना और सूरीनाम में ऐसा नहीं हुआ था. जिन लोगों को अपने निर्णय या अपने माता-पिता के निर्णय पर पछतावा हुआ, उन्हें हिन्दू धर्म में लौटने का अवसर मिल गया. इसी कारण त्रिनिदाद के आर्य समाज में अन्य कैरेबियाई देशों के आर्य समाजों की तुलना में कहीं अधिक पूर्व-ईसाई थे. इस आन्दोलन में कुछ ऐसे सदस्य भी शामिल थे जो शुद्धि के लिये तैयार नहीं हुए और ईसाई रहते हुए भी इस आन्दोलन से जुड़े रहे.
पंडित अयोध्या प्रसाद ने चचुआनास में पहले आर्य मंदिर की नींव भी रखी, जिसे मॉन्ट्रोस मंदिर और ‘वैदिक चर्च’ भी कहा जाता था. इस मंदिर को प्राथमिक विद्यालय के रूप में भी इस्तेमाल किया गया. 11 नवम्बर 1943 से यह मन्दिर आर्य समाज एसोसिएशन के मुख्यालय के रूप में उपयोग में लाया गया. 1943 में आर्य समाज एसोसिएशन को औपनिवेशिक ब्रिटिश अधिकारियों से मान्यता मिल गयी. जनवरी 1937 में ही संगठन का नाम ”आर्य प्रतिनिधि सभा’ त्रिनिदाद’ करने का निर्णय ले लिया गया था, जो 1943 में सरकारी मान्यता के बाद आधिकारिक नाम बन गया. उस वर्ष इसकी दस शाखाएँ थीं और आर्य प्रतिनिधि सभा त्रिनिदाद में नौ प्राथमिक विद्यालय चलाती थी.


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